Tuesday, August 27, 2013

तेरे मेरे जीवन कि डगार, एक रेल कि पटरी ही तो है

तेरे संग चलने कि चाह में, तेरे कदम से कदम तो मिलाया था,
पर तेरे पलकों कि ओट में, मेरे ख्वाबों का संसार न था।
ये सफर शुरू तो किया मगर, ये बात ज़हन में आती है,
कि तेरे मेरे जीवन कि डगार, एक रेल कि पटरी ही तो है।

हम साथ चले मंज़िल कि ओर, पर मुझ पर तेरी नजर नहीं,
मैं राह् में अगर टूट भी जाऊँ, तुझको तो मेरी ख़बर भी नहीं।
हमें जोड़े रखे तार कई, पर तू मेरी आवाज़ नही सुन पाती है,
मैं मूड के तुझसे जुड़ना भी चाहूं, तुझसे टकरा हमारी राह बदल जाती है।

इस राह पर कितनों को मिलते देखा, हमराही हम, फिर भी हम साथ नहीं,
मंज़िल तो हमारी एक भी हों, पर तू मंज़िल पर भी साथ नहीं।

Wednesday, January 23, 2013

भाग भाग कर जीवन से, मैं क्या हासिल कर पाया हूँ



कुछ साँसें लेने जो, उस पड़ाव पर जा ठहरा,
पानी में प्रतिबिंब से, फिर वही सवाल कर बैठा हूँ।
कि भाग भाग कर जीवन से, मैं क्या हासिल कर पाया हूँ।

कुछ अनजाने रिश्तों की डोर बंधा आया हूँ,
कुछ जाने पहचाने रिश्ते पीछे छोड़ आया हूँ।
जिन्हें मोती की थी चाह, उन्हें मोती बाँट आया हूँ,
जिन्हें राह में देखा तन्हा, कुछ दूर हमसफ़र बन आया हूँ।
जिन्हें ठोकर खा गिरते देखा, उनका हमदर्द बन आया हूँ,
जिन्हें मझधार में बहते देखा, उनका साहिल बन आया हूँ

भाग भाग कर जीवन से, मैं क्या हासिल कर पाया हूँ?
उस आखिरी पड़ाव पर, है बस मुझको इतना अरमान,
चाहे रहे, कच्ची सड़क, या रहे रेत का मकान।
उस हमदर्द, हमसफ़र, साथी के आँखों में,
ना रहे कभी आसूओं की धार,
जिन आँखों में खुशियों की फुहार छोड़ आया हूँ।

Monday, July 9, 2012

फिर से ठहराव कहाँ से लाऊँ


तालाब किनारे बैठे, उन आँखों में कुछ सपने थे,
कुछ अपनौं के, कुछ अपने थे।
पर उन आँखों में तैरते सपनों को, पूरा करने के,
औज़ार कहाँ से लाऊँ।

सागर किनारे बैठे, लहरों को बनते देखा है,
पानी की छलछलाहट से, साज़ो को बनते देखा है।
इस ठहरे तालाब के पानी में, सैलाब कहाँ से लाऊँ,
दिल के तारों को जो छू ले, वो आवाज़ कहाँ से लाऊँ।

इसी झुंझुलाहट में, एक कंकर तालाब में मैंने फेंका,
कंकर के स्पर्ष से तालाब में, लहरों को बनते मैंने देखा।
जल तरंग के कोलाहल से, इस दिल को ये महसूस हुआ,
कि तालाब में सैलाब लाने को, कंकर भी चाँद, सूरज बन सकता है।
और ताज बनाने को, पत्थर भी संगमरमर बन सकता है।

चल पङा वो कंकर लिए, अपना ताज बनाने मैं।
इस दिशाहीन जीवन में, जो नयी राह नज़र आई है,
उस राह पर रुक जाने को, फिर से  ठहराव कहाँ से लाऊँ,
और अपना ताज ना बनाने के, जज़बात कहाँ से लाऊँ।


In short.. To achieve success you several times look at the bigger picture and bigger things, but seldom ignore the small small items or ideas, that can lead you to tremendous success.. a thought shared by one of my good friend Chaitanya..

Monday, February 6, 2012

ठहराव कहाँ से लाउँ

अंधेरे गुफा में जिसने अपनी आँखें खोली,
जो उजाले पाने की चाह में, हर ठोकर से लङ जाए,
उस विवेकशून्य जीवन में, ठहराव कहाँ से लाउँ,
अंधेरे में भी खुश रहने के जज़बात कहाँ से लाउँ।

जलती, तपती,सुलगती रेत में,
जिसमें मृगतृष्णा को भी, शाद्वल बनाने की चाह है,
उस लालायित जीवन में, ठहराव कहाँ से लाउँ,
नागकनी से भी तृप्त होने के जज़बात कहाँ से लाउँ।

सितारों की चमचम में जो हार गया सब कुछ,
जिसे सूरज सी ताप और उँचाईयों की लालसा हो,
उस महत्वकांशी जीवन में, ठहराव कहाँ से लाउँ,
चंद्रमा से भी संतुष्ट होने के जज़बात कहाँ से लाउँ।


In short, the one who dares, wins whatever he/she wants in his/her life. Nobody can stop you if you dare to achieve the goals that you have set in your life.

Wednesday, January 4, 2012

सूखा बरगद


शीतल वायू के साथ,
जीवन की खिलती बगिया में,
सुबह के सूरज की लाली से,
अनगिनत वृक्ष भी जो छाया दे,
उस छाया का मान भी क्या ?

थका टूटा सूरज जब,
अथाह सागर की ओर बढ़े,
जो संध्या की बेला में बढ़े,
और अँधेरे में दामन छोड़ दे,
उस बढ़ते, छुपते साये का मान ही क्या ?

दुपहरी के तपते सुलगते सूरज का,
जो ताप पी कर भी तुझको छाँव दे,
वो सूखा बरगद ही सही,
उसे पहचानो, उसे मान दो।
क्योंकि जीवन के घने अँधेरे में,
जब सब साये भी साथ छोड़ दे,
वो सूखा बरगद खुद जलकर भी,
तेरे जीवन में ज्योत भर दे।

Summary:
Don't judge a friend who is with you in your happy times and leaves you when you need them the most. Find and respect those, who are with you, when you are in troubled waters. He might not be the happiest person in the world, he might not be the richest person in the world, still he will enrich you with happiness. These friends are the one who can go to any extent when you need them the most...
Dedicated to one of my such friend..

Wednesday, December 7, 2011

कीचङ का कमल

कूँ कूँ का शोर सुनकर, झटके खा कर,
जब मैंने खिङकी से बाहर देखा,
वहाँ दूर डूबते सूरज मे,
अपना डूबता जीवन देखा।

वीराने मे रुकी इस रेलगाङी से,
जब मैंने नीचे आकर देखा,
क्षणभर को मुझे इस गाङी मे,
अपना दिशाहीन प्रतिबिंब दिखा।

ना होश कि जाना है इस ओर,
या उस डगर मुझे अब जाना है,
जब देखा मैंने उस लङके को,
जिसे कीचङ का वो कमल पाना है।

कीचङ का एक कमल पाने,
वो कीचङ मे बढ़ निकला था,
कीचङ मे गिर कर, आँखें खो,
वो दिशाहीन हो फिरता था।

कीचङ के कमल को छोङ,
अब वो बढ़ा, बोरवैल की ओर,
स्वच्छ साफ हो,
वो फिर बढ़ा कमल की ओर।

लाख संभल वो कदम बढ़ाए,
फिर भी कमल तक आते आते, वो फिसल जाए,
हार न माने वो फिर भी,
स्वच्छ साफ हो फिर वापस आए।

मैंने टोका, ओ लङके,
तू क्यूँ कीचङ से घबराए, नहाए,
जो कीचङ से घबराए,
वो कमल कभी न पाए।

वो मुसकुरा कर बोला, साहब,
कीचङ से मैं न घबराऊँ,बस चाहूँ,
इस स्वच्छ कमल की कोमलता पर,
मैं कीचङ न लगाउँ, जबभी इसे पाउँ।

तभी इंजन की सीटी से,
मुझे दिशा का अभास हुआ,
उस स्वच्छ हाथों मे कमल देख,
स्वच्छता के महत्व का एहसास हुआ।

[ We have always heard, if u fail, try again.. Be prepared for opportunities... By this poem I just want to say, if you fail and you know you are getting another chance, make yourself handsomely prepared, so that even the success is proud to be with you and there is no chance of failure.. ]

Friday, December 2, 2011

दस्तक

वो दस्तक सुनकर जब मैं,
उस अंधियारे से बाहर निकला,
दिये कि हल्कि लौ ने भी,
मेरे आँखौं को चौंधा दिया।

उस लौ के पार मैंने देखा,
कुछ दूर तो कोहरा छाया है,
पर इस कोहरे के पार कहीं,
इस जंगल के पार कहीं,
जिंदगी आज भी चमकती है।

उस दस्तक ने वो राह दिखाई,
जिस पर नंगे पाँव मैं चल निकला।
वो डगमगाए, लङखङाए,
क्योंकि, कुछ टूटे काँच के टुकङे, कुछ सपने,
अब भी इन पैरों में चुभते हैं।

इन तन्हा राहों में खुद ही,
मुझे ये टुकङे हटाने हैं, 
इक सँवरा राह बनाना है,
खुद ही ये जंगल पार करना है।
क्योंकि, इसी काले अँधेरे जंगल के पार कहीं,
इक नया सवेरा बसता है,
कुछ नए सपने बसते हैं।