Friday, December 2, 2011

दस्तक

वो दस्तक सुनकर जब मैं,
उस अंधियारे से बाहर निकला,
दिये कि हल्कि लौ ने भी,
मेरे आँखौं को चौंधा दिया।

उस लौ के पार मैंने देखा,
कुछ दूर तो कोहरा छाया है,
पर इस कोहरे के पार कहीं,
इस जंगल के पार कहीं,
जिंदगी आज भी चमकती है।

उस दस्तक ने वो राह दिखाई,
जिस पर नंगे पाँव मैं चल निकला।
वो डगमगाए, लङखङाए,
क्योंकि, कुछ टूटे काँच के टुकङे, कुछ सपने,
अब भी इन पैरों में चुभते हैं।

इन तन्हा राहों में खुद ही,
मुझे ये टुकङे हटाने हैं, 
इक सँवरा राह बनाना है,
खुद ही ये जंगल पार करना है।
क्योंकि, इसी काले अँधेरे जंगल के पार कहीं,
इक नया सवेरा बसता है,
कुछ नए सपने बसते हैं।

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