इन काली वीरान रातों में,
फिर तनहा तनहा फिरता हूँ।
इन तनहा राहों में फिरते फिरते,
एक रोज़ कदम उस तरफ मुड़े,
जिन राहों में एक और कदम,
किसी और मंजिल की राह तके।
उस मंजिल से गिरते गिरते,
वो कदम जब इस ओर मुड़े,
इन खुशनसीब कदमों को,
कुछ देर तो एक हमसफ़र मिला।
उन तनहा काली रातों में,
उन उलझी उलझी राहों में,
उस मोड़ पर जो तुम छोड़ गए,
मेरे कदम वहीँ पर ठहर गए।
कुछ देर वहां मैं ठहरा था,
तेरी राहों पर मेरा पहरा था।
पर फिर इन काली रातों में,
मैं तनहा तनहा फिरता हूँ।
उस पेड़ से गिरते पत्ते के साये में,
तेरे साये को ढूंढता रहता हूँ।
हवा से सरसराते पत्तों की आहात में,
तेरे क़दमों की आहट को सुनता हूँ।
इन तनहा सूनी रातों में,
तू दूर कहीं जा बैठी है,
इन नज़रों की नादानी देख,
वो अब भी तुझे यहाँ खोजती हैं।
ना मंजिल की है चाह कोई,
ना किसी साथी की है तलाश कोई,
इस पूनम की चांदनी रात में,
जब एक साथी मुझको और मिला,
उस बदल की शैतानी देख,
उसने मुझको फिर तनहा छोड़ दिया।