Saturday, July 24, 2010

Katran

जिस पल यह द्योंढी पार किया,
कतरन से एक टुकड़ा और दिया।

रेशम का एक रेशा,
पेटीदार से निकला था,
लाड दुलार मार देकर,
रेशे मजबूत बनाने को,
कई रेशों को जोड़, डोर किया।

उस द्योंढी से जब डोर निकला,
तो कई डोरों से उलझा था।
उन डोरों को सुलझाने, कुछ करने,
डोर से मखमल बनाने को,
कुछ कमजोर डोरों को काट दिया ।

करघे पर बुनकर रेशमी डोर से,
उस द्योंढी से मखमल निकला था,
शीशे जड़ कर रेशमी धागों से,
मखमली चादर बनाने को,
कुछ हिस्सों को काट दिया।

सर्द रातों में कोमल सपने देने,
कोमल चादर बन निकला था,
कोमल सपनो में आने की लालच में,
मखमली लिहाफ बनाने को,
एक टुकड़ा मैंने तुमको दिया।

सपने तो छोटे होते हैं,
कुछ रात बदले तो बदलते हैं,
बदले सपनो की टीस से, बहते आँसू पोछने,
मखमली रुमाल बनाने को,
एक टुकड़ा मैंने और दिया।

राह बदले सपने बदले,
उस द्योंढी से जब मैं निकला,
जीवन को एक नया रूप देने,
मखमली पोशाक बनाने को,
एक टुकड़ा मैंने और दिया।

जिस पल ये द्योंढी पार किया,
कतरन से एक टुकड़ा और दिया।

आज, आईने में देखा,
हर तरफ से कुतरा हुआ है कतरन,
इस कतरन से आगे क्या होगा?
एक रेशमी डोर से, पैबंद लगाने को,
हर टुकड़ा जोड़ने मैं निकला।