कूँ कूँ का शोर सुनकर, झटके खा कर,
जब मैंने खिङकी से बाहर देखा,
वहाँ दूर डूबते सूरज मे,
अपना डूबता जीवन देखा।
वीराने मे रुकी इस रेलगाङी से,
जब मैंने नीचे आकर देखा,
क्षणभर को मुझे इस गाङी मे,
अपना दिशाहीन प्रतिबिंब दिखा।
ना होश कि जाना है इस ओर,
या उस डगर मुझे अब जाना है,
जब देखा मैंने उस लङके को,
जिसे कीचङ का वो कमल पाना है।
कीचङ का एक कमल पाने,
वो कीचङ मे बढ़ निकला था,
कीचङ मे गिर कर, आँखें खो,
वो दिशाहीन हो फिरता था।
कीचङ के कमल को छोङ,
अब वो बढ़ा, बोरवैल की ओर,
स्वच्छ साफ हो,
वो फिर बढ़ा कमल की ओर।
लाख संभल वो कदम बढ़ाए,
फिर भी कमल तक आते आते, वो फिसल जाए,
हार न माने वो फिर भी,
स्वच्छ साफ हो फिर वापस आए।
मैंने टोका, ओ लङके,
तू क्यूँ कीचङ से घबराए, नहाए,
जो कीचङ से घबराए,
वो कमल कभी न पाए।
वो मुसकुरा कर बोला, साहब,
कीचङ से मैं न घबराऊँ,बस चाहूँ,
इस स्वच्छ कमल की कोमलता पर,
मैं कीचङ न लगाउँ, जबभी इसे पाउँ।
तभी इंजन की सीटी से,
मुझे दिशा का अभास हुआ,
उस स्वच्छ हाथों मे कमल देख,
स्वच्छता के महत्व का एहसास हुआ।
[ We have always heard, if u fail, try again.. Be prepared for opportunities... By this poem I just want to say, if you fail and you know you are getting another chance, make yourself handsomely prepared, so that even the success is proud to be with you and there is no chance of failure.. ]
Wednesday, December 7, 2011
Friday, December 2, 2011
दस्तक
वो दस्तक सुनकर जब मैं,
उस अंधियारे से बाहर निकला,
दिये कि हल्कि लौ ने भी,
मेरे आँखौं को चौंधा दिया।
उस लौ के पार मैंने देखा,
कुछ दूर तो कोहरा छाया है,
पर इस कोहरे के पार कहीं,
इस जंगल के पार कहीं,
जिंदगी आज भी चमकती है।
उस दस्तक ने वो राह दिखाई,
जिस पर नंगे पाँव मैं चल निकला।
वो डगमगाए, लङखङाए,
क्योंकि, कुछ टूटे काँच के टुकङे, कुछ सपने,
अब भी इन पैरों में चुभते हैं।
इन तन्हा राहों में खुद ही,
मुझे ये टुकङे हटाने हैं,
इक सँवरा राह बनाना है,
खुद ही ये जंगल पार करना है।
क्योंकि, इसी काले अँधेरे जंगल के पार कहीं,
इक नया सवेरा बसता है,
कुछ नए सपने बसते हैं।
उस अंधियारे से बाहर निकला,
दिये कि हल्कि लौ ने भी,
मेरे आँखौं को चौंधा दिया।
उस लौ के पार मैंने देखा,
कुछ दूर तो कोहरा छाया है,
पर इस कोहरे के पार कहीं,
इस जंगल के पार कहीं,
जिंदगी आज भी चमकती है।
उस दस्तक ने वो राह दिखाई,
जिस पर नंगे पाँव मैं चल निकला।
वो डगमगाए, लङखङाए,
क्योंकि, कुछ टूटे काँच के टुकङे, कुछ सपने,
अब भी इन पैरों में चुभते हैं।
इन तन्हा राहों में खुद ही,
मुझे ये टुकङे हटाने हैं,
इक सँवरा राह बनाना है,
खुद ही ये जंगल पार करना है।
क्योंकि, इसी काले अँधेरे जंगल के पार कहीं,
इक नया सवेरा बसता है,
कुछ नए सपने बसते हैं।
Wednesday, November 9, 2011
मंज़िल
जिस मंज़िल पर आ पहुँचा हूँ,
उस मंज़िल को मैं ना पाता।
उस रोज़ जो मैं उन कदमों को,
तेरी ओर आने से रोक पाता ।
तेरे पलकों के झपकने को,
गर मैं इशारा ना समझता।
इस मंज़र तक लाने वाले,
वो कदम मैं ना बढाता ।
जब तक ना जाना था तुझको,
हर किलकारी ही शोर लगती थी ।
तेरे साथ बिताए उस सावन में,
हर लब्ज बारिश की छम छम लगती थी ।
बारिश की छम छम में जो मैं,
इस तनहाई का सन्नाटा सुन पाता ।
उस रोज़ मैं इन कदमों को,
तेरी ओर बढने से रोक पाता ।
तेरे ज़ुल्फों के लहलहाने में,
उड़ते बादल मैं देखता था ।
बादल से निकलते चाँद सा,
तेरे चेहरे की चाँदनी देखता था ।
इस चाँदनी को चुराने वाली,
उस अमावस को गर मैं देख पाता।
उस रोज़ मैं इन कदमों को,
तेरी ओर बढने से रोक पाता ।
जिस मंज़िल पर आ ठेहरा हूँ,
वहाँ वो सावन अक्सर आता है,
उस चाँद में तेरी छबि देखने वाले इस आँखों में,
वो बारिश छोड़ जाता है ।
उस मंज़िल को मैं ना पाता।
उस रोज़ जो मैं उन कदमों को,
तेरी ओर आने से रोक पाता ।
तेरे पलकों के झपकने को,
गर मैं इशारा ना समझता।
इस मंज़र तक लाने वाले,
वो कदम मैं ना बढाता ।
जब तक ना जाना था तुझको,
हर किलकारी ही शोर लगती थी ।
तेरे साथ बिताए उस सावन में,
हर लब्ज बारिश की छम छम लगती थी ।
बारिश की छम छम में जो मैं,
इस तनहाई का सन्नाटा सुन पाता ।
उस रोज़ मैं इन कदमों को,
तेरी ओर बढने से रोक पाता ।
तेरे ज़ुल्फों के लहलहाने में,
उड़ते बादल मैं देखता था ।
बादल से निकलते चाँद सा,
तेरे चेहरे की चाँदनी देखता था ।
इस चाँदनी को चुराने वाली,
उस अमावस को गर मैं देख पाता।
उस रोज़ मैं इन कदमों को,
तेरी ओर बढने से रोक पाता ।
जिस मंज़िल पर आ ठेहरा हूँ,
वहाँ वो सावन अक्सर आता है,
उस चाँद में तेरी छबि देखने वाले इस आँखों में,
वो बारिश छोड़ जाता है ।
Saturday, March 19, 2011
फिर तनहा तनहा फिरता हूँ
इन काली वीरान रातों में,
फिर तनहा तनहा फिरता हूँ।
इन तनहा राहों में फिरते फिरते,
एक रोज़ कदम उस तरफ मुड़े,
जिन राहों में एक और कदम,
किसी और मंजिल की राह तके।
उस मंजिल से गिरते गिरते,
वो कदम जब इस ओर मुड़े,
इन खुशनसीब कदमों को,
कुछ देर तो एक हमसफ़र मिला।
उन तनहा काली रातों में,
उन उलझी उलझी राहों में,
उस मोड़ पर जो तुम छोड़ गए,
मेरे कदम वहीँ पर ठहर गए।
कुछ देर वहां मैं ठहरा था,
तेरी राहों पर मेरा पहरा था।
पर फिर इन काली रातों में,
मैं तनहा तनहा फिरता हूँ।
उस पेड़ से गिरते पत्ते के साये में,
तेरे साये को ढूंढता रहता हूँ।
हवा से सरसराते पत्तों की आहात में,
तेरे क़दमों की आहट को सुनता हूँ।
इन तनहा सूनी रातों में,
तू दूर कहीं जा बैठी है,
इन नज़रों की नादानी देख,
वो अब भी तुझे यहाँ खोजती हैं।
ना मंजिल की है चाह कोई,
ना किसी साथी की है तलाश कोई,
इस पूनम की चांदनी रात में,
जब एक साथी मुझको और मिला,
उस बदल की शैतानी देख,
उसने मुझको फिर तनहा छोड़ दिया।
फिर तनहा तनहा फिरता हूँ।
इन तनहा राहों में फिरते फिरते,
एक रोज़ कदम उस तरफ मुड़े,
जिन राहों में एक और कदम,
किसी और मंजिल की राह तके।
उस मंजिल से गिरते गिरते,
वो कदम जब इस ओर मुड़े,
इन खुशनसीब कदमों को,
कुछ देर तो एक हमसफ़र मिला।
उन तनहा काली रातों में,
उन उलझी उलझी राहों में,
उस मोड़ पर जो तुम छोड़ गए,
मेरे कदम वहीँ पर ठहर गए।
कुछ देर वहां मैं ठहरा था,
तेरी राहों पर मेरा पहरा था।
पर फिर इन काली रातों में,
मैं तनहा तनहा फिरता हूँ।
उस पेड़ से गिरते पत्ते के साये में,
तेरे साये को ढूंढता रहता हूँ।
हवा से सरसराते पत्तों की आहात में,
तेरे क़दमों की आहट को सुनता हूँ।
इन तनहा सूनी रातों में,
तू दूर कहीं जा बैठी है,
इन नज़रों की नादानी देख,
वो अब भी तुझे यहाँ खोजती हैं।
ना मंजिल की है चाह कोई,
ना किसी साथी की है तलाश कोई,
इस पूनम की चांदनी रात में,
जब एक साथी मुझको और मिला,
उस बदल की शैतानी देख,
उसने मुझको फिर तनहा छोड़ दिया।
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