जिस मंज़िल पर आ पहुँचा हूँ,
उस मंज़िल को मैं ना पाता।
उस रोज़ जो मैं उन कदमों को,
तेरी ओर आने से रोक पाता ।
तेरे पलकों के झपकने को,
गर मैं इशारा ना समझता।
इस मंज़र तक लाने वाले,
वो कदम मैं ना बढाता ।
जब तक ना जाना था तुझको,
हर किलकारी ही शोर लगती थी ।
तेरे साथ बिताए उस सावन में,
हर लब्ज बारिश की छम छम लगती थी ।
बारिश की छम छम में जो मैं,
इस तनहाई का सन्नाटा सुन पाता ।
उस रोज़ मैं इन कदमों को,
तेरी ओर बढने से रोक पाता ।
तेरे ज़ुल्फों के लहलहाने में,
उड़ते बादल मैं देखता था ।
बादल से निकलते चाँद सा,
तेरे चेहरे की चाँदनी देखता था ।
इस चाँदनी को चुराने वाली,
उस अमावस को गर मैं देख पाता।
उस रोज़ मैं इन कदमों को,
तेरी ओर बढने से रोक पाता ।
जिस मंज़िल पर आ ठेहरा हूँ,
वहाँ वो सावन अक्सर आता है,
उस चाँद में तेरी छबि देखने वाले इस आँखों में,
वो बारिश छोड़ जाता है ।
awesome work ! naye din aur nayi subah par bhi likh sakte ho !!
ReplyDeleteHey buddy... thanks a lot.. but do i know you?
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