Wednesday, December 7, 2011

कीचङ का कमल

कूँ कूँ का शोर सुनकर, झटके खा कर,
जब मैंने खिङकी से बाहर देखा,
वहाँ दूर डूबते सूरज मे,
अपना डूबता जीवन देखा।

वीराने मे रुकी इस रेलगाङी से,
जब मैंने नीचे आकर देखा,
क्षणभर को मुझे इस गाङी मे,
अपना दिशाहीन प्रतिबिंब दिखा।

ना होश कि जाना है इस ओर,
या उस डगर मुझे अब जाना है,
जब देखा मैंने उस लङके को,
जिसे कीचङ का वो कमल पाना है।

कीचङ का एक कमल पाने,
वो कीचङ मे बढ़ निकला था,
कीचङ मे गिर कर, आँखें खो,
वो दिशाहीन हो फिरता था।

कीचङ के कमल को छोङ,
अब वो बढ़ा, बोरवैल की ओर,
स्वच्छ साफ हो,
वो फिर बढ़ा कमल की ओर।

लाख संभल वो कदम बढ़ाए,
फिर भी कमल तक आते आते, वो फिसल जाए,
हार न माने वो फिर भी,
स्वच्छ साफ हो फिर वापस आए।

मैंने टोका, ओ लङके,
तू क्यूँ कीचङ से घबराए, नहाए,
जो कीचङ से घबराए,
वो कमल कभी न पाए।

वो मुसकुरा कर बोला, साहब,
कीचङ से मैं न घबराऊँ,बस चाहूँ,
इस स्वच्छ कमल की कोमलता पर,
मैं कीचङ न लगाउँ, जबभी इसे पाउँ।

तभी इंजन की सीटी से,
मुझे दिशा का अभास हुआ,
उस स्वच्छ हाथों मे कमल देख,
स्वच्छता के महत्व का एहसास हुआ।

[ We have always heard, if u fail, try again.. Be prepared for opportunities... By this poem I just want to say, if you fail and you know you are getting another chance, make yourself handsomely prepared, so that even the success is proud to be with you and there is no chance of failure.. ]

Friday, December 2, 2011

दस्तक

वो दस्तक सुनकर जब मैं,
उस अंधियारे से बाहर निकला,
दिये कि हल्कि लौ ने भी,
मेरे आँखौं को चौंधा दिया।

उस लौ के पार मैंने देखा,
कुछ दूर तो कोहरा छाया है,
पर इस कोहरे के पार कहीं,
इस जंगल के पार कहीं,
जिंदगी आज भी चमकती है।

उस दस्तक ने वो राह दिखाई,
जिस पर नंगे पाँव मैं चल निकला।
वो डगमगाए, लङखङाए,
क्योंकि, कुछ टूटे काँच के टुकङे, कुछ सपने,
अब भी इन पैरों में चुभते हैं।

इन तन्हा राहों में खुद ही,
मुझे ये टुकङे हटाने हैं, 
इक सँवरा राह बनाना है,
खुद ही ये जंगल पार करना है।
क्योंकि, इसी काले अँधेरे जंगल के पार कहीं,
इक नया सवेरा बसता है,
कुछ नए सपने बसते हैं।