कुछ साँसें लेने जो, उस पड़ाव पर जा ठहरा,
पानी में प्रतिबिंब से, फिर वही सवाल कर बैठा हूँ।
कि भाग भाग कर जीवन से, मैं क्या हासिल कर पाया हूँ।
कुछ अनजाने रिश्तों की डोर बंधा आया हूँ,
कुछ जाने पहचाने रिश्ते पीछे छोड़ आया हूँ।
जिन्हें मोती की थी चाह, उन्हें मोती बाँट आया हूँ,
जिन्हें राह में देखा तन्हा, कुछ दूर हमसफ़र बन आया हूँ।
जिन्हें ठोकर खा गिरते देखा, उनका हमदर्द बन आया हूँ,
जिन्हें मझधार में बहते देखा, उनका साहिल बन आया हूँ
भाग भाग कर जीवन से, मैं क्या हासिल कर पाया हूँ?
उस आखिरी पड़ाव पर, है बस मुझको इतना अरमान,
चाहे रहे, कच्ची सड़क, या रहे रेत का मकान।
उस हमदर्द, हमसफ़र, साथी के आँखों में,
ना रहे कभी आसूओं की धार,
जिन आँखों में खुशियों की फुहार छोड़ आया हूँ।
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