तेरे संग चलने कि चाह में, तेरे कदम से कदम तो मिलाया था,
पर तेरे पलकों कि ओट में, मेरे ख्वाबों का संसार न था।
ये सफर शुरू तो किया मगर, ये बात ज़हन में आती है,
कि तेरे मेरे जीवन कि डगार, एक रेल कि पटरी ही तो है।
हम साथ चले मंज़िल कि ओर, पर मुझ पर तेरी नजर नहीं,
मैं राह् में अगर टूट भी जाऊँ, तुझको तो मेरी ख़बर भी नहीं।
हमें जोड़े रखे तार कई, पर तू मेरी आवाज़ नही सुन पाती है,
मैं मूड के तुझसे जुड़ना भी चाहूं, तुझसे टकरा हमारी राह बदल जाती है।
इस राह पर कितनों को मिलते देखा, हमराही हम, फिर भी हम साथ नहीं,
मंज़िल तो हमारी एक भी हों, पर तू मंज़िल पर भी साथ नहीं।
पर तेरे पलकों कि ओट में, मेरे ख्वाबों का संसार न था।
ये सफर शुरू तो किया मगर, ये बात ज़हन में आती है,
कि तेरे मेरे जीवन कि डगार, एक रेल कि पटरी ही तो है।
हम साथ चले मंज़िल कि ओर, पर मुझ पर तेरी नजर नहीं,
मैं राह् में अगर टूट भी जाऊँ, तुझको तो मेरी ख़बर भी नहीं।
हमें जोड़े रखे तार कई, पर तू मेरी आवाज़ नही सुन पाती है,
मैं मूड के तुझसे जुड़ना भी चाहूं, तुझसे टकरा हमारी राह बदल जाती है।
इस राह पर कितनों को मिलते देखा, हमराही हम, फिर भी हम साथ नहीं,
मंज़िल तो हमारी एक भी हों, पर तू मंज़िल पर भी साथ नहीं।
No comments:
Post a Comment